"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

भगवान परशुराम पोर्टल

भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जीवन, उनकी शिक्षाएँ, प्रतीक और उनसे जुड़े शास्त्रीय संदर्भ — एक स्थान पर।

समर्पित पोर्टल

स्वरूप और गुण

योद्धा ऋषि

तप और शौर्य का अद्वितीय संगम — अन्याय के विरुद्ध अटल।

गुरुओं के गुरु

भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों के शस्त्र-गुरु।

चिरंजीवी

सात चिरंजीवियों में एक — आज भी मार्गदर्शक चेतना।

भूमि के सृजक

परशु से सागर पीछे हटाकर कोंकण-केरल भूमि का सृजन।

जीवन-यात्रा

जीवन के प्रमुख प्रसंग

जन्म से चिरंजीवित्व तक — नौ पड़ावों में भगवान परशुराम की कथा।

  1. 01

    अवतरण

    अक्षय तृतीया को महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पाँचवें पुत्र के रूप में अवतार। बाल्यकाल का नाम — राम।

  2. 02

    शिव आराधना

    कठोर तप द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे शस्त्र-विद्या तथा दिव्य अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया।

  3. 03

    परशु की प्राप्ति

    भगवान शिव से विद्युदभि नामक परशु प्राप्त हुआ। इसी परशु के कारण राम "परशुराम" कहलाए।

  4. 04

    पितृ-आज्ञा की परीक्षा

    पिता की आज्ञा का पालन कर मातृ-वध किया, और फिर वरदान माँगकर माता को पुनर्जीवित कराया — आज्ञापालन और भक्ति दोनों का आदर्श।

  5. 05

    कार्तवीर्य अर्जुन का वध

    सहस्रबाहु कार्तवीर्य द्वारा आश्रम पर आक्रमण और कामधेनु के अपहरण के बाद अधर्म का अंत किया।

  6. 06

    महेन्द्र पर्वत पर तप

    शस्त्र त्यागकर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन हुए — क्रोध के बाद संयम की स्थापना।

  7. 07

    भूमि-दान और सागर-निवर्तन

    जीती हुई समस्त भूमि महर्षि कश्यप को दान की, और परशु से सागर पीछे हटाकर कोंकण-केरल की भूमि प्रकट की।

  8. 08

    गुरु-रूप

    भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण — तीनों महारथियों को शस्त्र-विद्या प्रदान की। शिक्षा ही उनकी सबसे बड़ी विरासत रही।

  9. 09

    चिरंजीवित्व

    सात चिरंजीवियों में एक। शास्त्रों के अनुसार कल्कि अवतार के शस्त्र-गुरु के रूप में उनकी भूमिका शेष है।

शास्त्र व शोध

ज्ञान कोश

वैदिक स्रोत, पुराण-संदर्भ, प्रतीकों का अर्थ और शिक्षाएँ — प्रामाणिक सामग्री पर आधारित संक्षिप्त आलेख।

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